मेरा #MeToo उस वक्त का है, जब मेरे पास भाषा नहीं थी

लड़कियां मुझसे इनबाॅक्स में पूछ रही हैं कि मैं #Metoo पर कुछ क्यों नहीं बोल रही… और मैं सोच रही हूं कि ऐसा क्यों है कि मैं नहीं बोल रही. अब इतना कुछ दिखता है और इतनी परतों में दिखता है कि कुछ भी बोलना आसान नहीं लगता.

मेरा ज्यादातर मी टू उस वक्त का है, जब मेरे पास भाषा नहीं थी. जब मुझे बोलना नहीं आता था, ना बोलना नहीं आता था, ठीक से हां बोलना भी नहीं आता था. जब मैं बस चीजों को देखना सीख ही रही थी. तब गली, मोहल्ले, पड़ोस, परिवार, रिश्तेदार, सब जगह सब तरह के अनुभव रहे. दुख रहा, गुस्सा रहा, डर रहा, बहुत वेदना रही. समय के साथ उसे प्राॅसेस करना सीखा.

फिर वक्त के साथ समझ आई और भाषा आई, कहने का सलीका आया. ना बोलना आया, फैसले लेना आया. अब सब ठीक-ठीक ही है जिंदगी में.

बाकी मी टू के नाम पर बहुत कुछ ऐसा भी हो रहा है, जो मुझे लगता है कि शायद निजी दुख, पीड़ा ज्यादा है. जिंदगी में अनेकों बार ये होगा कि दिल टूटेगा, भरोसा टूटेगा, प्रेम टूटेगा, कोई नकार देगा, कोई छोड़ देगा, कोई अकेला कर देगा, कोई धोखा देगा, कोई वैसे नहीं देखेगा तुम्हें, जैसे तुमने देखा. वो साथ होने, न हो पाने की बहुत सारी वेदना होगी. लगेगा धोखा दे दिया, इस्तेमाल कर लिया, फिर रिजेक्ट कर दिया. ये सब होगा, ये सब होता है जीवन में और ऐसे ही होता है. लेकिन मेरी नजर में ये #Metoo नहीं है.

जब कोई अकेला होगा, जब उसे सहारा चाहिए होगा तो मदद का कोई हाथ बढेगा. लगेगा, मदद वाला नर्म हाथ है, उस हाथ को पकड़कर डर भी कम लगेगा, लेकिन मुमकिन है उस हाथ के इरादे कुछ और हों. उस हाथ के इरादे पूरे न हों तो अगली बार वो मदद का हाथ भी न मिले. ये भी धोखा और मैनिपुलेशन ही लगेगा. लेकिन फिर उम्र और वक्त गुजरते हैं और समझ में आता है कि मदद के हाथ बहुत हैं नहीं दुनिया में. अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी होती है. अपने डर का खुद ही सामना करना होता है. वो झूठी मदद, वो मैनिपुलेशन की कहानी भी #Metoo नहीं है.

और इन सबकी जगह भी फेसबुक नहीं है. बावजूद इसके कि इन सबमें बहुत बार पुरुष प्रिवेलेज की स्थिति में था. तुम ज्यादा कमजोर, डरी, सहमी, बहुत वलनरेबल, बहुत नाजुक और बहुत अकेली थी.

ये जीवन की दुख कथा तो हो सकती है, लेकिन ये #Metoo नहीं है.

मनीषा पांडे की फेसबुक वाल से

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